बिल्ली जैसी चपलता, काली वर्दी में ये आतंकियों के ऊपर टूट पड़ते हैं, देश के सबसे खतरनाक कमांडो फोर्स के बारें में 8 बेहद खास बातें

देश पर कोई आतंकी हमला हो या उससे भी बड़ी आफत, ब्लैक कैट कमांडो या एनएसजी कमांडो हर खतरे से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. देश के सबसे खतरनाक कमांडो हैं ब्लैक कैट कमांडो. आईए जानते हैं देश के सबसे बहादुर जवानों के दस्ते एनएसजी कमांडो के बारें में 8 बेहद खास बातें
41512837
1.ब्लैक कैट कमांडो या नेशनल सिक्योरिटी गार्ड आज के दौर में सबसे खतरनाक कमांडोज हैं. इस विभाग को 16 अक्टूबर 1984 में देश में आतंकियों से निपटने के लिए बनाया गया था. कमांडोज कमांडोज एनएसजी को ‘नेवर से गिवअप’ यानी कभी हार ना मानने वाला भी कहते हैं.

2.काली वर्दी और बिल्ली जैसी चपलता के कारण इन्हें ब्लैक कैट कहा जाता है. हर किसी को ब्लैक कैट कमांडो बनने का मौका नहीं मिलता है. इसके लिए आर्मी, पैरा मिलिट्री या पुलिस में होना जरूरी है. आर्मी से 3 और पैरा मिलिट्री से 5 साल के लिए जवान कमांडो ट्रेनिंग के लिए आते हैं.

3.एनएसजी का एक कमांडो आतंकवादियों के पूरे एक गैंग पर भारी पड़ता है. एक कमांडो किसी भी किस्म के खतरे से आखिरकार पार पा लेता है. इसका कारण है क्योंकि इन कमांडोज को शारीरिक, मनोवैज्ञानिक हर तरह की ट्रैनिंग दी जाती है

सौजन्य- हरिभूमि.कॉम

सौजन्य- हरिभूमि.कॉम


4.राष्टीय सुरक्षा गार्ड की रूपरेखा तय करते समय इजरायल के आत्मघाती कमांडोज को ध्यान में तो रखा ही गया साथ ही अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस के एलीट कमांडो फोर्सेस को भी ध्यान में रखा गया. जिससे कि एनएसजी कमांडो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ फोर्स बन सके. आज एशिया में तो भारत के एनएसजी कमांडो के मुकाबले कोई दूसरी फोर्स नहीं है.
सौजन्य- इंडिया टीवी

सौजन्य- इंडिया टीवी


7.एनएसजी कमांडो बनने से पहले 90 दिन की विशेष ट्रैनिंग की शुरुआत में 18 मिनट के भीतर 26 करतब करने होते हैं, और 780 मीटर की बाधाओं को पार करना होता है. अगर सैनिक शुरूआत में ये सारा कोर्स 20-25 मिनट के भीतर पूरा नहीं करते, तो उन्हें रिजेक्ट कर दिया जाता है. जबकि ट्रैनिंग के बाद इन्हें अधिक से अधिक 18 मिनट के भीतर ये तमाम गतिविधियां निपटानी होती हैं. किसी भी चुने गये कमांडो को नब्बे दिनों की अनिवार्य टेनिंग के दौरान 50 से 62 हजार जिंदा कारतूसों का अपनी फायर प्रैक्टिस में प्रयोग करना होता है. जबकि किसी सामान्य सैनिक की पूरी जिंदगी में भी इतनी फायर प्रैक्टिस नहीं होती. कई बार तो एक दिन में ही एक रंगरूट को दो से तीन हजार फायर करनी होती है.

8.साल 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को आतंकवादियों की कैद से मुक्त कराने के लिए जब भारतीय सेना ने कार्रवाई की, तो वह कार्रवाई सफल तो रही, लेकिन इस कार्रवाई में काफी सारे सैनिक शहीद हुए और इससे भी बड़ी बात यह हुई कि अमृतसर के ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर को नुकसान हुआ. इस ऑपरेशन के बाद ही ये तय किया गया कि देश में एक ऐसी फोर्स होनी चाहिए, जो खतरनाक और संवेदनशील मौकों पर सफाई से कार्रवाई कर सके. और फिर बनीं देश की सबसे बेहतरीन कमां

Comments

comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *