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गजब बेटियां: एक बिहार से तो एक असम से, इनकी मां बेचती हैं सब्जी, बेटियां इंटरनेशनल खिलाड़ी

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ये दो किस्से देश के पिछड़े राज्यों बिहार और असम की है. जहां दो बेटियां अपने जज्बे के बदौलत न केवल परिवार का सम्मान बढ़ा रही हैं बल्कि दूसरों के लिए मिसाल भी बनी हैं.

बेटियां: बिहार की पूजा ने सच किए सपने

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फोटो: फर्स्टपोस्ट डॉट कॉम
तमाम मुश्किलों को पीछे छोड़ते हुए बिहार की पूजा कुमारी आज भारतीय अंडर 19 फुटबॉल टीम की सदस्य हैं. पूजा की मां कटिहार में सब्जी बेचती हैं. पूजा इस वक्त रायगढ़ में हैं. नेशनल टीम के साथ वो दुबई में होने वाले टूर्नामेंट की तैयारी कर रही हैं. पूजा गांधी हाई स्कूल की छात्रा हैं और दसवीं क्लास में पढ़ती हैं.

पड़ोसियों के झेलने पड़ते थे ताने

पूजा के माता-पिता के लिए परिवार का खर्च चलाना आसान नहीं था. लेकिन बेटी के सपने को पूरे करने के लिए वो पीछे नहीं हटे. पांचवीं क्लास में पूजा थीं, जब खेल से जुड़ीं. तभी उन्होंने अपनी इच्छा जताई थी.
नॉर्मल स्कूल टाइमिंग के बाद वे एक्स्ट्रा स्पोर्ट्स क्लास करती थीं. उस वक्त उनके पिता रामजनम और सजनी देवी को पड़ोसियों के ताने झेलने पड़े. खासतौर पर इस बारे में कि बढ़ती बच्ची को शॉर्ट्स और टी-शर्ट पहनकर खेलने भेजते हैं.

शाम को सब्जी का ठेला पूजा ही खींचकर लाती हैं

पूजा 5 भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर हैं. वो अपने मां-बाप की भी मदद करती हैं. पूजा अक्सर उस जगह जाती है, जहां उसके पिता सब्जी बेचते हैं. सब्जी बेचने और तौलने में वो माता-पिता की मदद करती हैं. हमेशा वो जिद करती है कि शाम को ठेला वही खींचकर घर लाएगी.

बेटियां: असम की जमुना बोडो मुफलिसी से जीतकर विजेता बनी

असम की रहने वाली जमुना बोडो की मां निर्माली बोडो शोणितपुर जिले में एक रेलवे स्टेशन के बाहर सब्जियां बेचती हैं. लेकिन जमुना आज एक इंटरनेशनल बॉक्सर हैं. गांव में बिना किसी खास सुविधा के जमुना ने इंटरनेशनल लेवल पर कई मेडल जीतकर मुकाम बनाया है.

जमुना के पिता नहीं, घर का बोझ मां पर है

19 साल की जमुना जब 10 साल की थी तभी उनके पिता की मौत हो गई. उनकी एक बहन और एक भाई है. ऐसे में परिवार का पूरा बोझ मां पर है जो सब्जियां बेचकर घर का खर्च चलाती हैं. लेकिन अब जमुना देश-विदेश में कामयाबी का पताका फहरा रही हैं.
  • जमुना ने साल 2013 में सर्बिया में आयोजित सेकंड नेशंस कप इंटरनेशनल सब-जूनियर गर्ल्स बॉक्सिंग टूर्नामेंट में गोल्ड जीतकर महिला बॉक्सिंग में अपनी अलग पहचान बनाई.
  • साल 2014 में रूस में भी हुई एक प्रतियोगिता में गोल्ड के साथ चैंपियन बनीं.
  • साल 2015 में ताइपे में हुई यूथ वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भारत की तरफ से खेलते हुए 57 किलोग्राम वर्ग में जमुना ने कांस्य पदक जीता था.

आसान नहीं था सफर

जमुना पहले वुशु मार्शल ऑर्ट्स सीखती थी, गांव में सुविधा नहीं थी फिर जमुना के कोच ने उनका दाखिला गुवाहाटी खेल प्रशिक्षण केंद्र में कराया. अकादमी में वो अक्सर लड़कों के साथ बॉक्सिंग ट्रेनिंग करती थी. जमुना के मुताबिक मां को ऐसे काम करता देख उन्हें और भी ज्यादा मेहनत करने की प्रेरणा मिलती थी.
मैरी कॉम को प्रेरणा मानने वाली जमुना का अगला लक्ष्य 2020 में टोक्यो में होने वाले ओलंपिक खेलों में क्वॉलीफ़ाई करना है. जमुना मेडल लाकर भारत का नाम रोशन करना चाहती हैं.
बिहार और असम ये दो बेटियां भविष्य में भी कमाल करेंगी. गजब इंडिया इनको सलाम करता है.

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