125 साल पहले स्वामी विवेकानंद ने पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया था, स्वामीजी के बारे में खास बातें

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आज से ठीक 125 साल पहले स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो में विश्व धार्मिक सम्मेलन में भाषण दिया था. ये भाषण न उस समय कोई भूल पाया है, न आज भूल पाया है न आने वाले कल में कोई भूल पाएगा. शून्य के महत्व और भारतीय परंपरा पर विवेकानंद के भाषण की पूरी दुनिया दीवानी हो गई थी, 11 सितंबर 1893 में दिया गया ये भाषण, दुनियाभर में भारत की पहचान बन गया था. ऐसे में आइए जानते हैं महान संत स्वामी विवेकानंद के बारे में कुछ बेहद खास बातें:

 

विवेकानंद
स्वामी जी

कोलकाता में हुआ था स्वामी विवेकानंद का जन्म

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता के एक हिंदू परिवार में हुआ था. उनकी मां ने उनका नाम रखा वीरेश्वर, बाद में उनका नाम नरेंद्रनाथ दत्त रखा गया था वहीं नरेंद्रनाथ आगे चलकर स्वामी विवेकानंद बने. देशभर में स्वामी जी के जन्मदिवस 12 जनवरी को युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है.

 

साधारण छात्र होने के बावजूद पढ़ने की ललक

नरेंद्रनाथ एक साधारण बच्चे जैसे थे लेकिन उन्हें पढने में काफी रूचि थी. उन्हें वेद, उपनिषद, भगवत गीता, रामायण, महाभारत और पुराण में काफी रूचि थी.

नरेन्द्रनाथ इश्वर चन्द्र विद्यासागर इंस्टीट्यूट में पढ़ते थे. बाद में उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से एंट्रेंस की परीक्षा पास की. उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से पश्चिमी इतिहास और पश्चिमी दर्शनशास्त्र का भी अभ्यास कर रखा था. 1884 में उन्होंने अपनी बैचलर की डिग्री पूरी की.

असमय पिता की मृत्यु से परिवार की हालत बिगड़ी

नरेंद्रनाथ के पिता विश्वनाथ दत्ता कलकत्ता हाई कोर्ट में काम करते थे और उनकी माता गृहिणी थी. विश्वनाथ के निधन के बाद स्वामी के परिवार के आर्थिक हालात खराब हो गए थे.

ग्रेजुएट होने के बावजूद शुरुआत में नौकरी नहीं मिली. इससे हालत और बुरी हो गई. बाद में खेत्री के महाराजा अजीत सिंह स्वामीजी की मां को आर्थिक सहायता के तौर पर नियमित रूप से 100 रूपये भेजते थे. ये व्यवस्था सबसे छिपी हुई थी. बता दें कि नरेंद्रनाथ को विवेकानंद का नाम भी अजीत सिंह ने ही दिया था.

जीवन का टर्निंग प्वाइंट

विवेकानंद हमेशा लोगो से उनके भगवान और धर्म पर विचारो को पूछते है, उन्हें अपने प्रश्न का जवाब रामकृष्ण से मिला. नवम्बर 1881 में पहली बार वे स्वामी रामकृष्ण से मिले थे. तभी से उन्होंने रामकृष्ण को अपना गुरु माना था.16 अगस्त 1886 को रामकृष्ण की मृत्यु हो गयी. इसके बाद स्वामी रामकृष्ण के मिशन की जिम्मेदारियां स्वामी विवेकानंद पर ही आ गई.

1893 का शिकागो सम्मेलन और शोहरत

साल 1893 में अमेरिका के शिकागो में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व विवेकानंद ने किया. वहां उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत ‘सिस्टर एंड ब्रदर्स ऑफ़ अमेरिका’ के साथ की थी, इसी वाक्य ने सभी का दिल जीत लिया था.

11 सितम्बर को ही “विश्व भाईचारा दिवस” मनाया जाता है. इसी दिन स्वामी विवेकानंद ने शिकागो धर्म संसद में अपना भाषण दिया था. स्वामी जी में इतनी सादगी थी कि 1896 में तो उन्होंने लंदन में कचौरियां तक बना दी थीं. बता दें कि अंग्रेजी के जानकर विवेकानंद को ग्रेजुएशन के दौरान अंग्रेजी में बेहद कम नंबर मिले थे.

खुद की थी मौत की भविष्यवाणी

स्वामी विवेकानंद ने अपने निधन से पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि वो सिर्फ 40 साल की उम्र तक जिंदा रहेंगे. साल 1902 में उनका निधन हुआ तब उनकी उम्र महज 39 साल थी. स्वामी विवेकानंद को 31 बीमारियां थी. अंत में उन्होंने समाधि में ही अपने प्राण त्याग दिया, 3 बार दिल का दौरा पड़ने के बाद वो हमेशा के लिए अमर हो गए.

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