CHESS

Travel Time: केरल के नशे के गिरफ्त वाले इस गांव को कैसे CHESS (शतरंज) ने बदल डाला

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केरल घूमने का अगर मन बना रहे हैं तो यहां त्रिशुर जिले के मरोत्तिचल गांव जाना बिलकुल न भूलना. इस गांव की खासियत हैं यहां का शतरंज (CHESS) के लिए जुनून. कभी नशे की गिरफ्त में पड़ चुका ये गांव कैसे बदला डालते हैं एक नजर:

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फोटो: The Hindu

नशे की गिरफ्त में था गांव, CHESS ने बदली जिंदगी

त्रिशुर की पहाड़ियों में बसा ये गांव घूमने के लिए अब मुफीद है. लेकिन ये गांव हमेशा से ऐसा नहीं था. 1970-80 के दशक में ये गांव पूरी तरह से नशे की गिरफ्त में था. शराब और जुए के कारण यहां बदतर हालात थे. शाम होते ही क्या बच्चे, क्या जवान क्या बूढ़ा हर कोई नशे और जुए में डूबकर अपनी जिंदगी बर्बाद करने उतर जाते थे. लेकिन अब यहां आपको लोग CHESS खेलते लोग नजर आएंगे.

कैसे आया ये बदलाव?

अब इस गांव में कम उम्र के बच्चे ही CHESS में पारंगत हो जाते हैं. लोगों के पास इतना समय ही नहीं होता कि जुए या शराब के लिए वक्त बर्बाद करें. इसका श्रेय जाता है गांव के सी. उन्नीकृष्णन को,

ये 70-80 के मध्य की बात है, तब उन्नीकृष्णन हाईस्कूल में पढ़ते थे वो नहीं चाहते थे कि उनका गांव इस कदर बर्बाद हो. उन्होंने अमेरिका के CHESS खिलाड़ी बॉबी फिशर से प्रभावित होकर खेल को सीखने का मन बनाया. पड़ोस के गांव में जाकर वे चेस सीखते और गांव वालों को सिखाते.

धीरे-धीरे बदल गई दुनिया

उन्नीकृष्णन ने गांव वालों को लगातार CHESS सीखाना शुरू किया. धीरे-धीरे पूरे गांव में ये खेल पसंदीदा बन गया.

CHESS का नशा चढ़ा और शराब का उतर गया. फिलहाल, उन्नीकृष्णन 59 साल के हैं. वो ‘मरोत्तिचल’ गांव में एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते हैं. उनकी दुकान पर गांव के शतरंज खिलाड़ी जुटे रहते हैं.

कृष्णन ने 600 से ज़्यादा लोगों को चेस खेलना सिखाया है. उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं, जिन्होंने स्टेट लेवल पर मेडल झटके हैं.

गांव के नाम रिकॉर्ड दर्ज

इस गांव में छोटी उम्र से लेकर बुजुर्ग CHESS खिलाड़ी भी हैं. साल 2016 में इस गांव के नाम एक समय में हज़ार से ज़्यादा खिलाडियों के शतरंज खेलने का एशियन रिकॉर्ड भी हो गया. अब लोग चेस से नशे को मात दे चुके हैं. आर्थिक हालात भी गांव के पहले से बेहतर हो रहे हैं.

(Chess)

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