प्रणब मुखर्जी ने RSS को सिखाया राष्ट्रवाद, बहुलतवाद का पाठ, जानिए भाषण की खास बातें

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आखिरकार पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आरएसएस के कार्यक्रम में शामिल हो ही गए. उन्होंने अपने संबोधन में आरएसएस को उसके ही मंच से राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता के मायने भी सिखाए. प्रणब ने ये बताया कि राष्ट्रवाद का संबंध किसी धर्म या भाषा से नहीं है. प्रणब ने भारत की बहुलतावादी संस्कृति का भी जमकर बखान किया. उन्होंने आरएसएस को बताया कि राष्ट्र की आत्मा बहुलवाद और धर्मनिरपेक्षता में बसती है.

फोटो- ट्विटर

RSS को संघ ने बताया, असहिष्णुता से राष्ट्र कमजोर होगा

पूर्व राष्ट्रपति ने साफ-साफ कहा कि घृणा से राष्ट्रवाद कमजोर होता है और असहिष्णुता से राष्ट्र की पहचान खराब होती है. उन्होंने कहा, सार्वजनिक संवाद में कई मतों को स्वीकार किया जाना चाहिए.

‘ऐसे भारत कमजोर हो जाएगा’

मुखर्जी बोले, धर्म , हठ और असहिष्णुता के माध्यम से भारत को परिभाषित करना इसे कमजोर करेगा. पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि समाज और देश को आगे ले जाने के लिए बातचीत बहुत जरूरी है. बिना संवाद के लोकतंत्र नहीं चल सकता है. हमें बांटने वाले विचारों की पहचान करनी होगी. हो सकता है कि हम दूसरों से सहमत हो और नहीं भी हों लेकिन किसी भी सूरत में विचारों की विविधता और बहुलता को नहीं नकार सकते हैं.

गांधी, नेहरू, पटेल का जिक्र

प्रणब ने अपने भाषण में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के दर्शनों की याद दिलाते हुए कहा कि राष्ट्रीयता एक भाषा, एक धर्म और एक शत्रु का बोध नहीं कराती है. अंग्रेजी में भाषण देते वक्त प्रणब ने बांग्ला और संस्कृत का भी इस्तेमाल किया, शायद वो अपने भाषण में भी बहुलतावाद को स्थापित कर रहे थे.

प्रणब ने कहा कि भारत में लोग 122 भाषाओं और 1,600 बोलियों का इस्तेमाल करते हैं. वे 7 प्रमुख धर्मो का पालन करते हैं और तीन प्रमुख नस्लों से आते हैं, मगर वे एक व्यवस्था से जुड़े हैं और उनका एक झंडा है. साथ ही भारतीयता उनकी एक पहचान है और उनका कोई दुश्मन नहीं है.

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