महागठबंधन के लिए संजीवनी साबित हो सकती हैं मायावती

OPINION

कर्नाटक चुनाव के बाद जब कुमारस्वामी कि शपथ ग्रहण समारोह में तमाम छोटे – बड़े विपक्षी दल एक साथ आये थे, ऐसा आज़ाद भारत में शायद दूसरी बार हुआ था. इससे पहले सन् 77 में जनता पार्टी बनी थी. जनता पार्टी उस समय के विपक्षी दलों के विलय से बनकर तैयार हुई थी. इंदिरा गाँधी कि करारी हार हुई और मोरारजी देसाई कि अध्यक्षता में सरकार बनाई गयी.

2019 में दिख सकता है ये नजारा

ऐसा ही कुछ 2019 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है. विलय तो नहीं मगर एक महागठबंधन बना है. जिसमें कांग्रेस, बसपा, राजद, माकपा, तृणमूल कांग्रेस समेत कई अन्य दल भी जुड़े हैं. जिनका लक्ष्य है नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ एकजुट होकर भाजपा को हराना.

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बसपा कि स्थापना 1984 में हुई. उसके बाद से बसपा ने कई चुनाव लड़े हैं. दलित राजनीति में बसपा ने अपने आप को सबसे बड़े दल के रूप में स्थापित किया है. 1989 में जब बसपा ने सबसे पहला लोकसभा चुनाव लड़ा था तब बसपा को 3 सीटों पर जीत मिली. उसके बाद से बसपा का प्रसार शुरू हुआ. बसपा के राजनीतिक सफर में सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ 1996 का लोकसभा चुनाव. जब बसपा को 4.02 प्रतिशत वोट के साथ 11 सीटों पर जीत मिली. इसके बाद से राष्ट्रीय राजनीति में बसपा का दखल बढ़ गया.

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2014 लोक सभा वोट प्रतिशत

2014 के आम चुनाव में बसपा 4.1 प्रतिशत वोट लेकर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. 34 सीटों पर बसपा दुसरे पायदान पर रही. 2014 के लोकसभा चुनाव में भले ही बसपा ने एक भी सीट ना जीती हो मगर अपना वोट सुरक्षित रखने में वो कामयाब रहीं.

 

2004 के चुनाव में बीएसपी ने जीते थे 19 सीट

इससे पिछले चुनावों पर अगर नज़र डालें तो हम देख सकते हैं, 2004 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने 19 सीटें जीती थी और 5.33 प्रतिशत वोट हासिल किये थे. वहीं 2009 का चुनाव भी बसपा के लिए दुसरा बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ. 2009 के चुनाव में बसपा को 21 सीटें मिली और 6.17 प्रतिशत वोट मिले.

अब बात 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव कि इसमें बसपा को करारी हार मिली. केवल 19 सीटों पर बसपा जीती मगर इनका जो वोट है. वो बरक़रार रहा. इस चुनाव में बसपा को यूपी में 22.24 प्रतिशत वोट मिले. माना जाता है ये 22 प्रतिशत बसपा के पक्के वोट हैं. किसी भी हाल में यूपी में ये वोट बसपा को ही मिलेंगे.

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यानी के अगर कोई बसपा से गठबंधन करे तो उसका बड़ा फायदा है. चाहे वो विधानसभा हो या लोकसभा.

सिर्फ यूपी ही नहीं बाक़ी के राज्यों में भी बसपा का वोट प्रतिशत काफ़ी महत्वपूर्ण है. 2009 में बसपा ने एक लोकसभा सीट मध्य प्रदेश में भी जीती थी. इसके अलावा मध्य प्रदेश में कई विधायक भी चुनकर आते हैं. इसके साथ बसपा का जनाधार पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और छतीसगढ़ में भी है. बसपा के शुरूआती दिनों में पंजाब से काफ़ी लोग जीतकर आये. मगर समय के साथ बसपा वहाँ अपने जनाधार में गिरावट दर्ज़ कराती आयी है.

मध्य प्रदेश में कई विधानसभा की सीटों पर बसपा का सीधा असर रहता है. मध्य प्रदेश की मौजूदा विधानसभा में बसपा के 4 विधायक हैं और 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 6.29 प्रतिशत वोट मिले थे. मध्य प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़ में भी बसपा का वोट प्रतिशत2013 में 4.27 रहा. सीटों के मामले में भले ही बसपा यूपी के अलावा दुसरे राज्यों में कमजोर हो मगर जनाधार कायम है. और ये उसका वोट प्रतिशत बताता है.

चलिए ये तो थी चुनावी गणित की बातें अब करते हैं मौजूदा परिस्थितियों की चर्चा.

इस साल के अंत में 4 राज्यों में विधानसभा के चुनाव हैं. उनमें से 2 हैं मध्य प्रदेश और छत्तिसगढ़. मायावती ने अजीत जोगी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के नेता हैं, पहले कांग्रेस में थे और फिलहाल कांग्रेस से निकाले हुए हैं. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे हैं. अब इन्होंने जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ नाम से अपनी पार्टी बना ली है. आगामी चुनावों में मायावती के साथ मिलकर छत्तिसगढ़ में चुनाव लड़ेंगे.

इसके अलावा मायावती ने मध्यप्रदेश में भी अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. इससे कांग्रेस के स्थानीय नेता परेशान है. वो चाहते हैं कि विधानसभा चुनाव में भी गठबंधन हो और जो सेकुलर, दलित और अल्पसंख्यक वोट हैं वो बंटे नहीं. जिसका नुकसान कांग्रेस को हो सकता है.

अब मेरे कुछ सवाल है.

क्या महागठबंधन का अस्तित्व केवल लोकसभा चुनाव के लिए है?

क्या महागठबंधन का प्रयोग विधानसभा चुनावों में नहीं किया जाना चाहिए? ( जिसके तर्ज़ पर लोकसभा चुनाव में रणनीति तैयार की जा सके).

ये महागठबंधन का सपना किसके लिए है?

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जब आपके पास मायावती और बसपा जैसी महाशक्ति है जिसके मिलने से आपको बड़ी जीत हासिल हो सकती है, तो विधानसभा चुनाव में उनसे दूरी क्यों?

इस पर महागठबंधन के नेताओं को विचार करना चाहिए. सपा – बसपा यूपी में साथ आये और उसका नतीजा लोकसभा उपचुनावों में सबने देखा.

फिर इंतज़ार किस बात का?

2019 तक यमुना में बहुत पानी बह जायेगा. अगर महागठबंधन है तो वो हर जगह हो. जनता का विश्वास भी उसी पर आधारित होगा. जब आपकी एकता गिने चुने मौको पर नज़र आएगी तो जनता कैसे आप पर यकीन करे? ध्यान रहे कि महागठबंधन को जनता के बीच स्थापित करने के लिए यही चुनाव कारगर साबित होंगे.

2019 में मायावती की भूमिका क्या होने वाली है?

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मायावती ने कुछ दिन पहले प्रेस के जरिये ये संदेश दिया कि ‘सम्मानजनक सीटें ना मिलने पर बसपा अकेले चुनाव लड़ेगी’. इसके बाद अखिलेश यादव ने कहा कि  ‘हम दो चार कदम पीछे हटने को तैयार हैं.’

मायावती के इस बयान पर अखिलेश के अलावा किसी और नेता कि प्रतिक्रिया नहीं आयी. शरद पवार ने एक इंटरव्यू में ये साफ कहा है कि महागठबंधन के लिए मायावती का साथ आना बेहद ज़रूरी है.

गौरतलब है कि मायावती और बसपा का वोट देश के लगभग हर राज्य में है. 2014 में बसपा अकेले 503 सीटों पर लड़ी थी. और देश कि तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी. महागठबंधन में सबसे अहम भूमिका में कांग्रेस के बाद बसपा कि होने वाली है. बाक़ी पार्टियाँ अपने राज्यों तक सीमित हैं. सपा को यूपी में ही वोट मिलेंगे और राजद को बिहार में ही वोट मिलेंगे मगर बसपा का वोट लगभग हर राज्य में है.

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