पुण्यतिथि: इंदिरा गांधी की मौत की वजह बना था ऑपरेशन ब्लू स्टार, जानिए बेहद खास बातें

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आज के ही दिन साल 1984 को देश की सबसे सशक्त प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी. 31 अक्टूबर को ही इंदिरा की सुरक्षा में तैनात बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी. सबसे पहले बेअंत ने .38 बोर की सरकारी रिवॉल्वर से इंदिरा गांधी पर फायर किया था. तीन गोलियां अभी चलीं थी कि कुछ सेकेंड बाद ही कॉन्स्टेबल सतवंत ने अपनी स्टेनगन से इंदिरा पर लगातार फायरिंग की. इंदिरा गांधी को करीब 30 गोलियां लगी थी.

फोटो-हिंदुस्तान टाइम्स

इन सबके पीछे था साल 1984 का ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’. इस ऑपरेशन को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को अलगाववादियों से आज़ाद कराने के लिए चलाया गया था. जानते हैं इसके बारे में हर खास बात

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  • ऑपरेशन में 492 नागरिकों की जानें गई थीं और सेना के चार ऑफिसर सहित 83 जवान शहीद हुए थे।
  • सिख, इस नरसंहार लिए इंदिरा गांधी को दोषी मानते थे और इसी कारण से उनकी हत्या कर दी गई।

लेकिन इस ऑपरेशन के पीछे इंदिरा गांधी की क्या सोच थी उनका क्या इरादा था, ये बात कम ही लोग जानते हैं…

प्लानिंग के अनुसार कुछ ऐसे होनी थी कार्रवाई

दरअसल, सेना ने कुछ और ही सोचा था उनके अनुसार ऑपरेशन ‘सनडाउन’ के तहत हेलिकॉप्टर के जरिए कमांडोज़ को गोल्डन टैम्पल के पास स्थित गुरुनानक निवास गेस्ट हाउस में उतारा जाना था.

उस वक्त जरनैल सिंह भिंडरावाले यहीं रहता था. इस ऑपरेशन के तहत भिंडरावाले के अपहरण की योजना थी. भारतीय खुफ़िया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) की सशस्त्र टुकड़ी द्वारा इस कार्यवायी को अंजाम दिया जाना था. इसे ऑपरेशन सनडाउन नाम इसलिए दिया गया था, क्योंकि सारी कार्रवाई आधी रात के बाद होनी थी.

कौन था जरनैल सिंह भिंडरावाला

  • जरनैल सिंह भिंडरावाले सिखों की धार्मिक संस्था दमदली टकसाल का लीडर था.
  • उसकी कट्टर विचारधारा ने लोगों पर गहरा असर डाला था और इसीलिए उसे संस्था की कमान सौंपी गई थी.
  • भिंडरावाले ने गोल्डन टैम्पल परिसर में बने अकाल तख्त को अपना मुख्यालय बना लिया था.
  • 1983 से वह हथियारबंद साथियों के साथ यहीं रहने लगा
  • सेना और उसके समर्थकों से गोल्डन टैम्पल को आज़ाद कराने के लिए ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ शुरू किया था.

इससे जुड़ी थी खालिस्तान आंदोलन की जड़े

1970 के दशक में भारत विरोधी ताकतों ने सिखों के मन में यह बात बैठा दी कि हिंदू उनका शोषण कर रहे हैं. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का राजनीतिक संगठन अकाली दल सिखों के लिए भारत सरकार से कुछ विशेष रियायतें चाहता था. इसके लिए वर्ष 1973 फिर 1978 में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया गया.

कहा जाता है कि अकालियों के इस रवैए पर अंकुश लगाने के लिए तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने सिखों के धार्मिक समूह दमदमी टकसाल के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरावाले का परोक्ष रूप से समर्थन किया. लेकिन धीरे-धीरे जरनैल सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ने लगी तो सरकार ने उसके सिर से अपना हाथ हटा लिया.

इससे खफ़ा होकर जरनैल सिंह ने सरकार के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया. 80 का दशक आते-आते यह सशस्त्र आंदोलन में बदल गया, जिसे खालिस्तान आंदोलन नाम दिया गया. आंदोलन के समर्थक पृथक सिख राष्ट्र की मांग करने लगे.अकाली दल के सदस्य भी सिखों के हितों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने लगे.

ऐसे हुई ऑपरेशन ब्लू स्टार की शुरुआत

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03 जून 1984

हरमिंदर साहब के आसपास तैनात किए गए केंद्रीय रिज़र्व फोर्स के जवानों से शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के कुछ सेवादारों की झड़प हो गई. इसके बाद इलाके में तनाव काफी बढ़ गया. इसे देखते हुए शाम तक पूरे क्षेत्र में कर्फ्यू लगा दिया गया. पैरा-मिलिट्री फोर्स के जवानों ने हालात पर काबू करने के लिए जगह-जगह फ्लैग मार्च निकाला.

04 जून 1984

5 जून को गुरु अर्जुन देव का शहीदी दिवस था, इसलिए मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ जमा होने लगी थी. सेना हरमिंदर साहिब को आतंकियों से मुक्त कराना चाहती थी.

05 जून 1984

कमांडिंग ऑफिसर मेजर जनरल कुलदीप सिंह बरार ने शाम को अपने कमांडोज़ को मंदिर में प्रवेश करने का आदेश दिया. लेकिन आतंकियों ने उन पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी. हमले में सेना के 20 से अधिक जवान शहीद हो गए.मजबूरी में सेना को टैंक का इस्तेमाल करना पड़ा.

06 जून 1984

सुबह हुए जोरदार धमाके में अकाल तख्त को काफी नुकसान हुआ. अकाल तख्त में जरनैल सिंह भिंडरावाले, उसका सहयोगी जनरल शाहबेग सिंह और उसके लगभग 40 साथी मृत पाए गए. करीब 200 आतंकियों ने समर्पण कर दिया. इस तरह गोल्डन टेंपल आतंकियों से आज़ाद हो गया.

दुखी थीं इंदिरा गांधी

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यह पता नहीं था ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ में लोगों की मौत भी होगी. दरअसल, उन्हें ऑपरेशन से पहले तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल अरुण कुमार वैद्य ने कहा था कि गोल्डन टैम्पल में कोई मौत नहीं होगी और न ही कोई घायल होगा. तत्कालीन रक्षा राज्यमंत्री के.पी. सिंहदेव चाहते थे कि तुरंत इंदिरा गांधी तक यह संदेश पहुंचा दिया जाए की ऑपरेशन कामयाब रहा, लेकिन बड़ी संख्या में सैनिक और आम लोग मारे गए हैं. खबर मिलते ही इंदिरा गांधी की पहली प्रतिक्रिया दुख भरी थी. उन्होंने यह सुनते ही कहा, ‘‘हे भगवान, इन लोगों ने तो मुझे बताया था कि कोई हताहत नहीं होगा.’’

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