भूपत सिंह चौहाण ‘इंडियन रॉबिन हुड’ जिससे पुलिस और शेर भी खौफ खाते थे

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कौन कहता है कि डाकू सिर्फ लूटने वाले होते हैं? हिन्दुस्तान में एक डाकू ऐसा भी हुआ जिसने जितना अमीरों से लूटा उससे कहीं ज्यादा गरीबों में लुटाया, तभी तो इंड़ियन रॉबिनहुड कहलाया। इंग्लैंड के रॉबिनहुड या हिंदी फिल्मों की तरह लगने वाली यह एक सच्ची घटना है। भूपतसिंह के कहर से जहां राजा-रजवाड़े और अंग्रेज कांपा करते थे, वहीं गरीबों के दिल में उसके लिए मसीहा का स्थान था।

ऐसा था इंडियन रॉबिन हुड

कठियावाड में जन्मा भूपत सिंह बचपन से ही बहादुर था। तेज भागने वाले घोड़ों पर सवार होकर हवा से बात करने की कला तो जैसे उसे वरदान में ही मिली थी। भूपत को जानने वाले लोग बताते हैं कि वह इतनी तेज दौड़ा करता था कि अगर उस समय ओलंपिक में भाग लेता तो कोई उसे हरा नहीं सकता था। लेकिन उसके भाग्य में कुछ और ही लिखा था। तेज भागना उसकी आदत थी, इसलिए वह ताउम्र भागता ही रहा।

राम भी और रावण भी

भूपत के शिकार बने कई लोगों का परिवार अब भी कठियावाड और आसपास के क्षेत्रों में रहते हैं। भूपत की कई क्रूरता भरी कहानियां हैं तो कई उसकी शौर्यगाथाओं और गरीबों के प्रति उसके प्रेम का गुणगान करती हुई भी हैं।

भूपत सिंह बूब से भूपत सिंह चौहाण

भूपत को तरह-तरह के खेलों का भी बहुत शौक था। लेकिन भूपत का जीवन शायद आलीशान महल में रहने के लिए नहीं था। इसलिए उसकी जिंदगी में एक साथ दो-दो ऐसी घटनाएं हुई कि उसने हथियार उठा लिए। दरअसल भूपत के जिगरी दोस्त और पारिवारिक रिश्ते से भाई राणा की बहन के साथ उन लोगों ने बलात्कार किया, जिनसे राणा की पुरानी दुश्मनी थी। जब इनसे बदला लेने राणा पहुंचा तो उन लोगों ने राणा पर भी हमला कर दिया। भूपत ने किसी तरह राणा को बचा लिया, लेकिन झूठी शिकायतों के चलते वह खुद इस मामले में फंस गया और उसे कालकोठरी में डाल दिया गया। बस, यहीं से खिलाड़ी भूपत मर गया और डाकू भूपत पैदा हो गया।

रॉबिन हुड़ का पहला कारनामा

वडोदरा के शासक गायकवाड परिवार को एक चिट्ठी मिली थी, जिसमें पूरे परिवार को धमकी लिखी थी की ‘महल में काम करने वाले सभी 42 नौकरों को उनकी सेवानिवृत्ति के समय पांच-पांच वीघा जमीन दी जाए और इसकी जाहिर सूचना पूरे शहर में भी दी जाए। अगर आपने ऐसा नहीं किया तो परिवार के सभी सदस्यों की एक-एक कर हत्या कर दी जाएगी।’ इस धमकी भरे पत्र के नीचे नाम लिखा था भूपत सिंह चौहाण यह वही भूपतसिंह था, जिसने वडोदरा से लेकर दिल्ली की सरकार तक की नाक में दम कर रखा था।

बन गया अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह

भूपत ने जेल से फरार होते ही पहली हत्या की। इस समय उसकी टोली में सिर्फ तीन ही व्यक्ति थे। लेकिन जैसे-जैसे वह अपराध की दुनिया में कदम बढ़ाता चला गया, उसके साथियों की संख्या भी बढ़ती चली गई। अपराध की चरम सीमा पर पहुंचने तक उसके 42 साथी थे और सब एक से बढ़कर एक बहादुर और क्रूर भी। भूपत उस समय का पहला ऐसा डाकू था, जिसने अपने 21-21 साथियों की दो टोलियां बना रखी थीं। इसमें भी खास बात यह है कि इन दोनों टोलियों के लिए सरदार नियुक्त थे, लेकिन हुक्म सिर्फ भूपत का ही चलता था। इसके अलावा दोनों टोलियां जंगल में अलग-अलग ही पड़ाव डाला करती थीं।

इस रॉबिन हुड़ को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था

कठियावाड में एक समय आया था, जब भूपत सिंह पूरे देश के राजा-रजवाड़ों और अंग्रजों के लिए सिरदर्द बन गया था। अंतिम समय तक भूपत सिंह को न तो किसी राजा की सेना पकड़ सकी और न ही ब्रितानी फौजें। अंतत: कई अंग्रेजों को मौत की नींद सुला देने वाले भूपत सिंह के बिना ही अंग्रेजों को वापस इंग्लैंड लौटना पड़ा। अंग्रेजी शासन के अंत के बाद इधर भारत सरकार भी भूपत को कभी पकड़ नहीं सकी।

गद्दार को मौत से भी खतरनाक सजा

भूपत से गद्दारी करते हुए उसका खबरी या उसके साथी पकड़े जाते तो वह उन्हें जान से नहीं मारता था, बल्कि उनकी नाक व कान काट दिया करता था। भूपत की इस क्रूर सजा का शिकार हुए लोगों की संख्या 40 से अधिक है। इसमें चार व्यक्ति तो अब भी सुरेंद्रनजर जिला में रहते हैं। इनमें से एक व्यक्ति के बताए अनुसार भूपत का मानना था कि हत्या करने की बजाय जीवन भर के लिए सजा देना अन्य लोगों को भी डराता रहता है। इसके अलावा भूपत उसे धमकी भी दिया करता था कि अगर उसने आत्महत्या की तो फिर उसके बाकी बचे परिवार की हत्या कर दी जाएगी। इस तरह से वे नाक-कान कटे लोगों को मरने भी नहीं देता था।

महिलाओं के लिए था मसीहा

भूपत सिंह को खौफनाक हैवान कहा जाता था। उसे अतिशय विकृत मानसिकता का व्यक्ति करार दिया गया था, लेकिन महिलाओं के मामले में उसकी तारीफ भी की जाती थी। क्योंकि डाकू और लुटेरा बनने के बाद भी उसके दिल में महिलाओं के लिए बहुत सम्मान था। उसने अपनी पूरी उम्र किसी भी महिला पर कभी हाथ नहीं उठाया। उसके अलावा उसके साथियों को भी निर्देश था कि कोई भी स्थिति हो, महिलाओं को सम्मान की ही नजर से देखा जाए। 1947 की आजादी के बाद पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। इस दौरान भूपत और उसके साथियों ने अपने दम पर सैकड़ों महिलाओं की आबरू बचाई। भूपत की इन्हीं अच्छाईयों की वजह से उसके क्रूर इतिहास को भुला दिया जाता था। इसके अलावा गरीब उसे अपना मसीहा भी मानते थे।

सब शेर कहते थे भूपत को

एक बार जब भारी पुलिस दल ने भूपत को जंगल में चारों ओर से घेर लिया तो वह शेर की गुफा में छिप गया। लगभग दो दिनों तक भूपत गुफा से बाहर नहीं निकला। जबकि इस गुफा में शेर का एक पूरा परिवार था। पुलिस इस गुफा तक पहुंच भी गई थी, लेकिन शेरों को देखकर उनकी हिम्मत गुफा में दाखिल होने की नहीं हुई। इसके अलावा उन्होंने यह भी सोचा कि कम से कम वह शेर की गुफा में तो नहीं छुपा होगा, वरना शेर उसे मारकर खा जाएंगे। जबकि पुलिस का यह अंदेशा था, पुलिस यह भूल गई थी कि वह कई सालों से उन्हीं शेरों के साथ रह रहा था। पुलिस के वापस जाने के बाद भूपत ने अपने साथियों तक अपने यह संदेशा पहुंचाया कि वह पुलिस के चंगुल से अब भी बाहर है। भूपत की यह अदा उसकी दिलेरी की कहानी खुद-ब-खुद बयां करती है।

हिन्दुस्तान का शेर पाकिस्तान में हुआ दफन

60 के दशक में कुछेक घटनाएं ऐसी हुईं कि भूपत कुछ समय के लिए पाकिस्तान चला गया। डाकू भूपत सिंह अपने तीन खास साथियों के साथ देश छोड़कर गुजरात के सरहदी रास्ते कच्छ से पाकिस्तान पहुंच गया। पाकिस्तानी सेना ने उसे गिरफ्तार कर लिया और उसे घुसपैठ के आरोप में जेल भेज दिया गया। उसे एक साल की सजा सुनाई गई। लेकिन सजा पूरी होने के बाद भूपत वापस भारत नहीं आया और वहीं स्थायी हो गया। पाकिस्तान में उसने मुस्लिम धर्म अंगीकार कर लिया और अब उसका नाम अमीन युसुफ हो गया। धर्म परिवर्तन के बाद उसने मुस्लिम लड़की से निकाह किया। उसके चार बेटे और दो बेटियां हुईं। हालांकि उसने व उसके अन्य साथियों ने भारत आने की कई कोशिशें की, लेकिन उसकी यह इच्छा पूर्ण नहीं हो सकी और पाकिस्तान की धरती पर ही 2006 में उसने दुनिया से विदा ली।

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