विदेशी जमीन पर इंडियन आर्मी के पहले अभियान ‘ऑपरेशन कैक्टस’ के बारे में जानिए खास बातें

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विदेशी जमीन पर किए गए इंडियन आर्मी के कितने ऑपरेशन याद हैं आपको ? शायद सर्जिकल स्ट्राइक, 28 सितंबर 2016 को इंडियन आर्मी के जवानों ने अपने साथियों की शहादत का बदला लेने के लिए पाकिस्तानी जमीन पर धावा बोला था. इंडियन आर्मी के जवानों ने पाकिस्तान के घर में घुसकर कई आतंकी ठिकानों को तबाह कर दिया और उस वक्त पूरे देश को ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का मतलब समझ आया.

फोटो-आजतक

सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक ही नहीं इंडियन आर्मी के ये ऑपरेशन जानिए

लेकिन ऐसा नहीं है कि इंडियन आर्मी ने विदेशी जमीन पर सिर्फ ये सर्जिकल स्ट्राइक ही किया है. भारत कई दशकों से विदेशी जमीन पर अभियानों के अंजाम देता रहा है. आइए हम आपको बताते हैं कि आर्मी की एक ऐसी शौर्य गाथा के बारे में जिसको जानकर आपको अपने जवानों पर गर्व का अहसास होगा.- साल 1988, ऑपरेशन कैक्टस

ऑपरेशन कैक्टस की जरूरत क्यों पड़ी

भारतीय सेना का ये अभियान मालदीव में चलाया गया था, साल 1988 में वहां के राष्ट्रपति अब्दुल गयूम के खिलाफ विद्रोह की कोशिश की गई. इस विद्रोह में श्रीलंकाई लड़ाकों की मदद ली गई. विद्रोह इतना बड़ा था कि हैरान-परेशान अब्दुल गयूम ने अमेरिका, पाकिस्तान, श्रीलंका समेत दुनिया के कई देशों से मदद की मांग की. कोई दूसरा देश अभी मदद के लिए आगे भी नहीं आया कि भारत ने मालदीव की सहायता के लिए हाथ आगे बढ़ाए.

मालदीव का विद्रोह किसने कराया था

दरअसल, मालदीव में तख्तापलट की ये कोशिश वहां एक नाराज NRI अब्दुल्ला लुतूफी ने की थी. लुतुफी ने हमलावरों को श्रीलंका से बुलवाया था. 80 लड़ाके समंदर के रास्ते मालदीव में घुसे थे, कुछ पहले से ही मालदीव पहुंच चुके थे. ऐसे में मालदीव 3 नवंबर 1988 के दिन हथियारों और बमों से गूंज उठा.

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राजीव गांधी की थी पहल

तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने फैसला लिया कि भारतीय सेनाएं वहां जाकर स्थिति को नियंत्रण में लाएंगी, इस पूरे अभियान को नाम दिया गया ‘ऑपरेशन कैक्टस’.

वो दौर ऐसा था जब गूगल, इंटरनेट का नामोनिशान भी नहीं था. मालदीव देश की भौगोलिक स्थिति और राजनीतिक-सामाजिक स्थिति की भी जानकारी किसी को साफ-साफ नहीं थी. लेकिन मदद का वादा किया जा चुका था.

कैसे तैयार की गई योजना

जल्दी-जल्दी में योजनाएं तैयार की गईं. इस ऑपरेशन पर एक किताब पूर्व सैन्य अधिकारी सुशांत सिंह लिख चुके हैं, उन्होंने अपनी किताब में लिखा है. ये एक जल्दीबाजी में की गई छोटी सर्जिकल स्ट्राइक थी. इसके नतीजे सटीक रहे लेकिन तैयारी अच्छी नहीं थी.

पता ही नहीं कि कार्रवाई करनी कहा है

तैयारियों का जिक्र करते हुए वो लिखते हैं, कि जब आपको ऐसे देश में कार्रवाई करनी है जहां कि जानकारी आप सिर्फ मानचित्र, कॉफी टेबल बुक को देखकर जुटा रहे हैं तो ऐसी स्थिति में आपकी किस्मत बहुत अच्छी होना जरूरी है.

एयरफोर्स रही अभियान की हीरो

राजीव गांधी के आदेश के बाद सेना तैयारी में जुट चुकी थी. सबसे अहम और बड़ी जिम्मेदारी एयरफोर्स को मिली थी. इस ऑपरेशन के लिए एयरफोर्स ने तीन ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट मुहैया कराए, जिसमें भारतीय सेना के जवान अनजान सी धरती मालदीव पर अभियान को अंजाम देने पहुंचे. सैनिकों ने श्रीलंकाई विद्रोहियों को चुन-चुनकर ढ़ेर किया और मुख्य आरोपी लुतूफी को पकड़ लिया. लुतूफी ने भी ये माना कि अगर भारतीय सेना नहीं पहुंचती तो वो विद्रोह को अंजाम तक पहुंचा देता.

भारत को मिला क्रेडिट

इस ऑपरेशन के बाद पूरी दुनिया ने भारत और इंडियन आर्मी की तारीफ की, तारीफ करने वालों में पाकिस्तान भी शामिल था.

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