भारतीयों के लिए लड़ने वाला अंग्रेज़ ए.ओ. ह्यूम जिसने कि ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना

PERSONALITIES

लाला लाजपत राय ने ह्यूम के बारे में लिखा है कि “ह्यूम स्वतन्त्रता के पुजारी थे और उनका हृदय भारत की निर्धनता तथा दुर्दशा पर रोता था।” यहाँ पर यह मानने में कोई भ्रम नहीं रहा कि ह्यूम निष्पक्ष एवं न्यायप्रिय व्यक्ति थे। उन्होंने ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ के प्रति अपनी बहुमूल्य तथा महान् सेवायें अर्पित की हैं। ह्यूम प्रशासनिक अधिकारी और राजनैतिक सुधारक के अलावा माहिर पक्षी-विज्ञानी भी थे, इस क्षेत्र में उनके कार्यों की वजह से उन्हें ‘भारतीय पक्षीविज्ञान का पितामह’ कहा जाता है।

एलेन ऑक्टेवियन ह्यूम (Allan Octavian Hume, जन्म- 6 जून, 1829; मृत्यु- 31 जुलाई, 1912) एक अवकाश प्राप्त अंग्रेज़ अधिकारी थे। ए.ओ. ह्यूम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उल्लेखनीय भूमिका निभाने वाले अंग्रेज़ राजनीतिज्ञ थे। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत के सबसे बड़े राजनीतिक दल ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना भी ह्यूम ने ही 28 दिसम्बर, 1885 ई. में की थी। 1912 ई. में उनकी मृत्यु हो जाने पर कांग्रेस ने ह्यूम को अपना ‘जन्मदाता और संस्थापक’ घोषित किया था।

ह्यूम लोकमान्य बालगंगाधर तिलक को सच्चा देशभक्त तथा भारत माता का सुपुत्र समझते थे। उनका विश्वास था कि वे भारत को अपने प्रयास द्वारा स्वतंत्रता अवश्य दिला सकेंगे। 1859 ई. में ए.ओ. ह्यूम ने ‘लोकमित्र’ नाम के एक समाचार-पत्र के प्रकाशन में सहयोग दिया। 1870 से 1879 ई. तक इन्होंने लेफ्टिनेंट गर्वनर के पद को इसलिए अस्वीकार कर दिया, क्योंकि इस पद पर रहकर वे भारतीयों की सच्चे मन से सेवा नहीं कर सकते थे। 1885 ई. के बाद लगभग 22 वर्षों तक उन्होंने कांग्रेस में सक्रिय सदस्य की भूमिका निभायी।

ह्यूम के मित्रों में दादा भाई नौरोजी, सर सुरेंद्रनाथ बनर्जी, सर फीरोज शाह मेहता, श्री गोपाल कृष्ण गोखले, श्री व्योमेशचंद्र बनर्जी, श्री बालगंगाधर तिलक आदि थे। इनके द्वारा शासन तथा समाज में अनेक सुधार हुए।

उन्होंने अपने विश्राम के दिनों में भारतवासियों को अधिक से अधिक अंग्रेजी सरकार से दिलाने की कोशिश की। इस संबंध में उनको कई बार इंग्लैंड भी जाना पड़ा।

इंग्लैंड में ह्यूम साहब ने अंग्रेजों को यह बताया कि भारतवासी अब इस योग्य हैं कि वे अपने देश का प्रबंध स्वयं कर सकते हैं। उनको अंग्रेजों की भाँति सब प्रकार के अधिकार प्राप्त होने चाहिए और सरकारी नौकरियों में भी समानता होना आवश्यक है। जब तक ऐसा न होगा, वे चैन से न बैठेंगे।

इंग्लैंड की सरकार ने ह्यूम साहब के सुझावों को स्वीकार किया। भारतवासियों को बड़े से बड़े सरकारी पद मिलने लगे। कांग्रेस को सरकार अच्छी दृष्टि से देखने लगी और उसके सुझावों का सम्मान करने लगी। ह्यूम साहब तथा व्योमेशचंद्र बनर्जी के हर सुझाव को अंग्रेजी सरकार मानती थी और प्रत्येक सरकारी कार्य में उनसे सलाह लेती थी। ह्यूम अपने को भारतीय ही समझते थे। भारतीय भोजन उनको अधिक पसंद था। गीता तथा बाइबिल को प्रतिदिन पढ़ा करते थे।

कांग्रेस की स्थापना

गोपाल कृष्ण गोखले के अनुसार 1885 ई. में ए. ओ. ह्यूम के सिवा और कोई व्यक्ति कांग्रेस की स्थापना नहीं कर सकता था। कांग्रेस के संस्थापक एलेन आक्टेवियन ह्यूम स्कॉटलैण्ड के निवासी थे। ‘इण्डियन सिविल सर्विस’ (भारतीय प्रशासनिक सेवा) में ह्यूम ने काफ़ी वर्षों तक कई महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया था। वे ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ के महामंत्री पद पर नियुक्त हुए थे, जिस पर उन्होंने 1906 ई. तक कार्य किया। उन्हें ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पिता’ के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से पूर्व कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों को एक मर्मस्पर्शी पत्र भी लिखा था, जिसका कुछ अंश इस प्रकार है-

“बिखरे हुए व्यक्ति कितने ही बुद्धिमान तथा अच्छे आशय वाले क्यों न हों, अकेले तो शक्तिहीन ही होते हैं। आवश्यकता है संघ की, संगठन की और कार्यवाही के लिए एक निश्चित और स्पष्ट प्रणाली की। आपके कन्धों पर रखा हुआ जुआ, तब तक विद्यमान रहेगा, जब तक आप इस ध्रुव सत्य को समझ कर इसके अनुसार कार्य करने को उद्यत न होंगें कि आत्म बलिदान और निःस्वार्थ कर्म ही स्थायी सुख और स्वतन्त्रता का अचूक मार्गदर्शन है।”

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