RSS के घोर आलोचक राजनीति के चर्चित चेहरे जॉर्ज फर्नांडिस के बारे में खास बातें

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भारतीय ट्रेड यूनियन राजनीति के चर्चित चेहरे और देश के पूर्व रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का 88 साल की अवस्‍था में मंगलवार को निधन हो गया। कर्नाटक में जन्‍मे जार्ज फर्नांडिस ने मुंबई और बिहार में राजनीति की। उनका पूरा सियासी सफर विवादों से भरा रहा।


सियासी सफर की शुरुआत ट्रेड यूनियन नेता के रूप में
फर्नांडिस अल्जाइमर बीमारी से पीड़ित थे। तीन जून 1930 को कर्नाटक में जन्मे जॉर्ज फर्नांडिस ने अपने सियासी सफर की शुरुआत ट्रेड यूनियन नेता के रूप में की। आरएसएस के कट्टर आलोचक रहे फर्नांडिस बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में रक्षा मंत्री बने।

जानिए जॉर्ज फर्नांडिज के बारे में
जन्म कर्नाटक में कर्मभूमि बिहार, महाराष्ट्र जॉर्ज फर्नांडिज ने का जन्‍म भले ही कर्नाटक में हुआ हो लेकिन उनकी कर्मभूमि महाराष्‍ट्र और बिहार रही। हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, मराठी, कन्नड़, उर्दू, मलयाली, तेलुगु, कोंकणी और लैटिन के जानकार जॉर्ज फर्नांडिस की छवि एक ऐसे विद्रोही नेता की थी जो अपनी धुन का पक्‍का था। उनका पूरा जीवन विवादों से भरा रहा। आइए नजर डालते हैं उनके सियासी सफर पर….

आपातकाल का किया जबरदस्त विरोध
आपातकाल के दौरान बिखरे बाल और हाथ में बेड़ी वाली उनकी एक तस्वीर उस दौर की सबसे यादगार तस्वीरों में एक है। फर्नांडिस का जन्म 1930 में कर्नाटक के एक ईसाई परिवार में हुआ था। 1974 में मुम्बई में मजदूर संघ के नेता के तौर पर रेल हड़ताल का आह्वान कर वह चर्चा में आए, जिससे देश में बंद की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।


आरएसएस के घोर आलोचक
दिलचस्प बात यह है कि 1989 में वी पी सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार में फर्नांडिस रेल मंत्री बने। आरएसएस के घोर आलोचक थे फर्नांडिस आरएसएस का घोर आलोचक होने के बावजूद फर्नांडिस 1998 से 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में शामिल हुए, जिसमें उन्हें रक्षा मंत्री का पद दिया गया।


पाकिस्तान से करगिल युद्ध
रक्षा मंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल में ही 1999 में भारत ने पाकिस्तान से करगिल युद्ध लड़ा। उनके कार्यकाल में ही भारत ने 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षण किया। इंदिरा गांधी को मात देकर 1977 में सत्ता में आई जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में वह उद्योग मंत्री भी रहे।


‘कोका कोला’ की जगह ‘77’
इसके तुरंत बाद ही उद्योगपतियों के साथ उनकी तना-तनी बढ़ गई और कोका-कोला तथा आईबीएम पर फर्नांडिस ने विदेशी मुद्रा विनिमय कानूनों के उल्लंघन के आरोप लगाए, जिसके चलते इन कंपनियों को भारत में अपना कारोबार समेटना पड़ा। ‘कोका कोला’ की जगह ‘77’ नामक एक स्थानीय ड्रिंक ने ली।


सक्रिय राजनीति से दूर
2009 के बाद सक्रिय राजनीति से दूर होते चले गए फर्नांडिस फर्नांडिस 2009 लोकसभा चुनाव में हार के बाद लगभग राजनीतिक रूप से निष्क्रिय होते चले गए। हालांकि, 2009-10 में वह राज्यसभा के सदस्य रहे।


सियासी सफर की शुरुआत
परिवार फर्नांडिस को पादरी बनाना चाहता था जॉर्ज फर्नांडिस को पादरी बनाने के लिए उनके परिवार ने उन्‍हें बेंगलुरु भेजा था लेकिन वह मुंबई चले आए और ट्रेड यूनियन से जुड़ गए। उन्‍होंने अपने सियासी सफर की शुरुआत मुंबई में एक ट्रेड यूनियन के नेता के रूप में की। 1950 और 60 के दशक में ट्रेड यूनियन लीडर के रूप में उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि उन्‍होंने वर्ष 1967 में कांग्रेस के दिग्‍गज नेता एसके पाटील को दक्षिण मुंबई सीट पर हुए लोकसभा चुनाव में हरा दिया।

दक्षिण मुंबई पाटील का गढ़ था और इस जीत के बाद वह ‘जाइंट किलर’ के नाम से मशहूर हो गए। वह रेल यूनियन से भी जुड़े थे। वर्ष 1974 की रेल हड़ताल के बाद वह कद्दावर नेता के तौर पर उभरे।

उन्‍होंने सोशलिस्‍ट आंदोलन को पूरे महाराष्‍ट्र में मजबूत किया। संसद में वह बड़े नेता के रूप में सामने आए और जनता के सवालों को उठाया। खुद को खुशवंत सिंह कहा करते थे फर्नांडिस आपातकाल लगने के बाद वर्ष 1975 में फर्नांडिस भूमिगत हो गए। गिरफ्तारी से बचने के लिए जॉर्ज फर्नांडिस को पगड़ी पहन और दाढ़ी रख कर सिख का भेष धारण किया था जबकि गिरफ्तारी के बाद तिहाड़ जेल में कैदियों को गीता के श्लोक सुनाते थे। उन्होंने बेबाकी के साथ इमर्जेंसी लगाए जाने का विरोध किया था। वह मशहूर लेखक के नाम पर खुद को खुशवंत सिंह कहा करते थे।

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