पहले लोकसभा चुनाव से लेकर हालिया चुनाव तक कितना बढ़ गया है खर्च? आप पर कैसे होता है असर

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भारतीय लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में भले ही इंडिया की टॉप पार्टियों के बीच वोटर्स के खातों में 72 हजार से लेकर 15 लाख जमा कराने की घोषणा वाली रेस जारी हो. लेकिन एक मामला ऐसा भी है जिसमें वोटर्स की हैसियत में वास्तव में तेजी से इजाफा हो रहा है. हम बात कर रहे हैं लोकसभा इलेक्शन में प्रति मतदाता उस चुनावी खर्च की जो कभी रुपैया से भी कम था लेकिन आज यह बढ़कर प्रति वोटर 50 रुपये तक जा पहुंचा है.

सबसे ज्यादा इजाफा साल 2014 में हुआ


भारत में पिछले चुनावों पर खर्च रकम की बात करें तो साल 2014 वाले चुनाव में इसमें सबसे ज्यादा इजाफा हुआ. चुनाव खर्च बढ़ने के भी कई कारण हैं, क्योंकि इस दौर के चुनाव में चुनाव प्रक्रिया में कई बड़े बदलाव हुए. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम-EVM) के शुरुआती दौर के कारण इऩ मशीनों के व्यापक प्रयोग से लेकर इनके इन्स्टॉलेशन और प्रयोग में लाने तक चुनाव आयोग को काफी प्रक्रियाओं से भी गुजरना पड़ा.


बात करें सबसे सस्ते और महंगे चुनाव की तो साल 1957 के दूसरे लोकसभा चुनाव में लगभग 10 करोड़ रुपए का खर्च होना बताया गया. साल 2014 के लोकसभा चुनाव को सबसे एक्सपेंसिव इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि इसके पहले लोक सभा चुनाव पर खर्च हुए कुल खर्च का तीन चौथाई हिस्सा 2014 के लोकसभा इलेक्शन में खर्च हुआ.
साल 2019 का लोकसभा इलेक्शन भी कई रिकॉर्ड ब्रेक करने के साथ ही नए कीर्तिमान रचने वाला है. चलिए अब इस चुनाव में वोटर्स के नाखून पर लगने वाली स्याही की ही बात करें. इस मामले में भारतीय निर्वाचन आयोग ने इसके लिए 26 लाख इंक बॉटल्स का ऑर्डर दिया है. आयोग को यह इंक 33 करोड़ रुपयों की पड़ने वाली है.
साल 2009 की कीमत के मुकाबले इस चुनाव में स्याही की कीमत 3 गुना बढ़ गई है. आयोग ने इस बार 90 करोड़ लोगों के लिए पक्की स्याही की डिमांड जताई है. मतलब चुनाव में लगने वाले टेबल-कुर्सी, कम्प्यूटर, ऑपरेटर्स से लेकर एक्सट्रा दीगर खर्चों को जोड़ने पर साल 2019 का चुनाव भी दुनिया में कई रिकॉर्ड कायम कर सकता है.
हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इस बार आयोग ने 9 सौ मिलियन वोटर्स को लेकर अपनी चुनावी तैयारी की है. आपको जानकर अचरज लगेगा कि दुनिया की बड़ी जनसंख्या वाले अमेरिका, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों की टोटल पापुलेशन से भी ज्यादा लोग इस बार भारत के लोकसभा चुनाव में वोटिंग करने वाले हैं. एक समय यह भी था जब भारत के पहले लोकसभा चुनाव में लगभग 20 करोड़ मतदाता शामिल हुए थे.


प्रति मतदाता खर्च (अनुमानित लागत(रुपयों में))
1951-52 – 0.6
1957 – 0.3
1962 – 0.34
1967 – 0.43
1971 – 0.42
1977 – 0.72
1980 – 1.54
1984 – 2.04
1989 – 3.09
1991 – 7.02
1996 – 10.08
1998 – 11
1999 – 15.3
2004 – 15.13
2009 – 15.54
2014 – 46.4
यह तो हुई आयोग की बात अब बारी है छोटी-बड़ी उन राजनीतिक पार्टियों की जिनका चुनावी खर्च करोड़ों तक जा पहुंचा है. बात कर्नाटक विधानसभा चुनाव की करें तो अनुमानित तौर पर यहां पार्टियों ने 10 हजार करोड़ से अधिक चुनाव पर खर्च कर डाला. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक यहां पार्टियों ने लगभग 357 करोड़ चंदे के रूप में जमा किए. इनमें से बीजेपी ने चंदे के जरिए लगभग 214 करोड़ जमा किए और लगभग 140 करोड़ रुपए खर्च करना बताया. इसके बाद कांग्रेस और अन्य पॉलिटिकल पार्टीज़ का नंबर रहा. वहीं सेंट्रर फॉर मीडिया स्टडीज़ (सीएमएस) की रिपोर्ट कहती है कि, कर्नाटक विधानसभा चुनाव देश के इतिहास का सबसे एक्सपेंसिव इलेक्शन रहा. रिपोर्ट बताती है कि साल 2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने चुनाव अभियान पर तकरीबन 712 करोड़ रुपये खर्च किए थे.
मतलब साफ इन पार्टियों को चंदा देने वाले अपने व्यापार या फिर सेवाओं के नाम पर बाद में जनता पर दाम बढ़ाकर एक्स्ट्रा बोझ डालते हैं. यानी नेता और पार्टियों का मुनाफा जहां तय है वहीं वोटर्स की जेब कटनी भी पक्की है. बढ़ते चुनावी खर्च का ही परिणाम है कि देश में भ्रष्टाचार में भी तेजी आई है. अब तक सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित रहा करप्शन अब रक्षा क्षेत्र में भी जड़ें जमा रहा है.
चुनाव आयोग के निर्देश
(खर्च रुपयों में)
लोक सभा चुनाव में अधिकतम खर्च की तय राशि – 70 लाख
विधानसभा चुनाव में अधिकतम खर्च की तय राशि – 28 लाख
पूर्वोत्तर के राज्यों की कुछ सीटों के लिए अधिकतम – 50 और 20 लाख

ईसी का गणित
इलेक्शन कमीशन ने इसके लिए एक फॉर्मूला बनाया है ताकि चुनावी खर्च पर लगाम कस सके. फार्मूला कहता है कि किसी भी पार्टी का कुल चुनावी खर्च कुल उम्मीदवारों के लिए तय अधिकतम सीमा से ज्यादा नहीं होना चाहिए.
इसे ऐसे समझा जा सकता है,- यदि कोई पार्टी 4 सौ कैंडिडेट चुनाव में उतारती है तो प्रति उम्मीदवार 70 लाख के लिहाज से कुल जमा खर्च 289 करोड़ रुपये का आंकड़ा सामने आता है. इस लिहाज से देखा जाए तो साल 2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने कुल 428 सीटों पर कैंडिडेट उतारे थे. ऐसे में पार्टी का औसतन प्रति सीट खर्च 1.67 करोड़ रुपये रहा.
आयोग ने चुनाव लड़ने की जो अधिकतम और न्यूनतम सीमा तय की है फिलहाल वो सफल साबित होती नहीं दिख रही क्योंकि इसको लागू करवा पाना फिलहाल इलेक्शन कमीशन के लिए किसी टेढ़ी खीर से भी कम नहीं है और न ही ईसी के पास टीएन शेषन जैसा लोकतंत्र का ही पुजारी अधिकारी ही है.

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