इलेक्टोरल बॉन्ड और चुनावी चंदे का क्या चक्कर है? लोकतंत्र के लिए खतरा क्यों है ये बॉन्ड?

FACTS

इलेक्टोरल बॉन्ड क्या हैं, चुनावी चंदे से इसका क्या लेना देना है? दरअसल, सरकार ने राजनीतिक दलों को मिलने वाली फंडिंग को पारदर्शी बनाने के लिए इलेक्टोरल बियरर बॉन्ड की शुरुआत की है, ये बॉन्ड एक प्रकार के प्रॉमिसरी नोट हैं, मतलब की ये धारक को उतने ही पैसे देना का वादा करते हैं. इलेक्टोरल बॉन्ड चुनावी चंदे के तौर पर सिर्फ राजनीतिक पार्टियों को दी जाती है और उसे वो भुना सकते हैं. ऐसे में कानून में बदलाव के बाद इस बॉन्ड के जरिए गुमनामी चंदे को मंजूरी मिलती है. ये कई लिहाज से सही नहीं है.

1 हजार से 1 करोड़ के इलेक्टोरल बॉन्ड

इलेक्टोरल बॉन्ड की शुरुआत 1 हजार से होती है, फिर 10 हजार, 1 लाख, 10 लाख और 1 करोड़ रुपये के बॉन्ड कोई खरीद सकता है. इसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के कुछ शाखाओं से बेचा जाता है. सरकार का दावा था कि इसमें चंदा देने वाले का नाम नहीं आने से पॉलिटिकल फंडिंग साफ-सुथरे होंगे, साथ ही ऐसे बॉन्ड पर टैक्स भी नहीं लगेगा.

इलेक्टोरल बॉन्ड पर आपत्ति क्या-क्या है?

इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ा एक कानून संशोधन भी किया गया, जिसके बाद राजनीतिक दलों को इस बॉन्ड के जरिए हासिल चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को देने की जरूरत ही नहीं रह गई. अब चुनाव आयोग को भी इस पर गहरी आपत्ति है, कारण ये है कि अगर चंदे का सोर्स ही नहीं बताया जाएगा तो ये पता नहीं लगाया जा सकेगा कि चंदा सरकारी या विदेशी सोर्स से आया है. जिसका फायदा राजनीतिक दल उठा सकते हैं.

सत्ताधारी दल के खाते में पैसे ही पैसे

इसकी बानगी यहां भी देखने को मिलती है कि मार्च, 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड से हुई कुल आमदनी का 95 फीसदी बीजेपी के खाते में आया. बीजेपी के सालाना ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी को मार्च 2018 में बिके इलेक्टोरल बॉन्ड से हुई आमदनी का 95% हिस्सा हासिल हुआ. मार्च 2018 में 222 करोड़ रुपयों के बॉन्ड की बिक्री हुई थी, जिनमें बीजेपी को 210 करोड़ रुपये मिले थे.

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